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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमद्य यथाशक्ति तव दास्यामि सुव्रत |  ९   क
शक्रभक्त्या तु ते पाणिं न दास्यामि कथञ्चन ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति