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आदि पर्व
अध्याय ४८
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सूत उवाच
पारिक्षितस्य यज्ञोऽसौ वर्ततेऽस्मज्जिघांसय़ा |  २३   क
व्यक्तं मय़ापि गन्तव्यं पितृराजनिवेशनम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति