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शान्ति पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्रजन्नेव गदाग्रजः प्रभुः; शशंस तस्मै निखिलेन तत्त्वतः |  १५   क
युधिष्ठिराय़ाप्रतिमौजसे तदा; यथाभवत्क्षत्रिय़सङ्कुला मही ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति