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शान्ति पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
त्रिःसप्तकृत्वो वसुधां कृत्वा निःक्षत्रिय़ां प्रभुः |  ९   क
इहेदानीं ततो रामः कर्मणो विरराम ह ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति