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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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वैशम्पाय़न उवाच
अथैनं वुद्धिसंय़ुक्तं पुनः स ददृशे हरिः |  २६   क
भूय़श्चैनं वचः प्राह सृजेमा विविधाः प्रजाः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति