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अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
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भीष्म उवाच
ज्याय़ांसमपि शीलेन विहीनं नैव पूजय़ेत् |  ४७   क
अपि शूद्रं तु सद्वृत्तं धर्मज्ञमभिपूजय़ेत् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति