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अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
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भीष्म उवाच
आत्मानमाख्याति हि कर्मभिर्नरः; स्वशीलचारित्रकृतैः शुभाशुभैः |  ४८   क
प्रनष्टमप्यात्मकुलं तथा नरः; पुनः प्रकाशं कुरुते स्वकर्मभिः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति