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अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
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महेश्वर उवाच
नष्टादित्ये तथा लोके तमोभूते नगात्मजे |  ४४   क
तृतीय़ं लोचनं दीप्तं सृष्टं ते रक्षता प्रजाः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति