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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मलेशप्रतिच्छन्नः प्रभवं धर्मकामय़ोः |  ५   क
अर्थमुत्सृज्य किं राजन्दुर्गेषु परितप्यसे ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति