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सभा पर्व
अध्याय ६१
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प्रह्लाद उवाच
त्वं वै धर्मस्य विज्ञाता दैवस्येहासुरस्य च |  ६५   क
व्राह्मणस्य महाप्राज्ञ धर्मकृच्छ्रमिदं शृणु ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति