सभा पर्व  अध्याय ४८

दुर्योधन उवाच

दत्त्वैकैको दशशतान्कुञ्जरान्कवचावृतान् |  २०   क
क्षमावतः कुलीनांश्च द्वारेण प्राविशंस्ततः ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति