सभा पर्व  अध्याय ४८

दुर्योधन उवाच

कृष्णाँल्ललामांश्चमराञ्शुक्लांश्चान्याञ्शशिप्रभान् |  ५   क
हिमवत्पुष्पजं चैव स्वादु क्षौद्रं तथा वहु ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति