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वन पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽहं सुहृदां वाचो दुर्योधनवशानुगः |  १०   क
स्मरणीय़ाः स्मरिष्यामि मय़ा या न कृताः पुरा ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति