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वन पर्व
अध्याय ११२
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ऋश्यशृङ्ग उवाच
तच्चापि हत्वा परिवर्ततेऽसौ; वातेरितो वृक्ष इवावघूर्णः |  ११   क
तं प्रेक्ष्य मे पुत्रमिवामराणां; प्रीतिः परा तात रतिश्च जाता ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति