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वन पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
यत्र सर्वान्महीपालाञ्शस्त्रतेजोभय़ार्दितान् |  १८   क
सवङ्गाङ्गान्सपौण्ड्रोड्रान्सचोलद्रविडान्धकान् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति