वन पर्व  अध्याय ४८

सञ्जय़ उवाच

पाञ्चालीं चाहुरक्लिष्टां वासुदेवस्य शृण्वतः |  ३१   क
दुर्योधनस्तव क्रोधाद्देवि त्यक्ष्यति जीवितम् |  ३१   ख
प्रतिजानीम ते सत्यं मा शुचो वरवर्णिनि ||  ३१   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति