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वन पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
पास्यन्ति रुधिरं तेषां गृध्रा गोमाय़वस्तथा |  ३३   क
उत्तमाङ्गानि कर्षन्तो यैस्त्वं कृष्टा सभातले ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति