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वन पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
तेषां द्रक्ष्यसि पाञ्चालि गात्राणि पृथिवीतले |  ३४   क
क्रव्यादैः कृष्यमाणानि भक्ष्यमाणानि चासकृत् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति