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वन पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
वृष्णय़ो वा महेष्वासा पाञ्चाला वा महौजसः |  ६   क
युधि सत्याभिसन्धेन वासुदेवेन रक्षिताः |  ६   ख
प्रधक्ष्यन्ति रणे पार्थाः पुत्राणां मम वाहिनीम् ||  ६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति