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वन पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
रामकृष्णप्रणीतानां वृष्णीनां सूतनन्दन |  ७   क
न शक्यः सहितुं वेगः पर्वतैरपि संय़ुगे ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति