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विराट पर्व
अध्याय ४८
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अर्जुन उवाच
उत्सृज्यैतद्रथानीकं गच्छ यत्र सुय़ोधनः |  १२   क
तत्रैव योत्स्ये वैराटे नास्ति युद्धं निरामिषम् |  १२   ख
तं जित्वा विनिवर्तिष्ये गाः समादाय़ वै पुनः ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति