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विराट पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्तः स वैराटिर्हय़ान्संय़म्य यत्नतः |  १३   क
निय़म्य च ततो रश्मीन्यत्र ते कुरुपुङ्गवाः |  १३   ख
अचोदय़त्ततो वाहान्यतो दुर्योधनस्ततः ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति