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विराट पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृज्य रथवंशं तु प्रय़ाते श्वेतवाहने |  १४   क
अभिप्राय़ं विदित्वास्य द्रोणो वचनमव्रवीत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति