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विराट पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
किं नो गावः करिष्यन्ति धनं वा विपुलं तथा |  १७   क
दुर्योधनः पार्थजले पुरा नौरिव मज्जति ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति