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विराट पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
ददृशुस्ते ध्वजाग्रं वै शुश्रुवुश्च रथस्वनम् |  २   क
दोधूय़मानस्य भृशं गाण्डीवस्य च निस्वनम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति