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विराट पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
एष तिष्ठन्रथश्रेष्ठो रथे रथवरप्रणुत् |  ५   क
उत्कर्षति धनुःश्रेष्ठं गाण्डीवमशनिस्वनम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति