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विराट पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
निरुष्य हि वने वासं कृत्वा कर्मातिमानुषम् |  ७   क
अभिवादय़ते पार्थः श्रोत्रे च परिपृच्छति ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति