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उद्योग पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
एष नाराय़णः कृष्णः फल्गुनस्तु नरः स्मृतः |  २०   क
नाराय़णो नरश्चैव सत्त्वमेकं द्विधाकृतम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति