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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
नापश्यच्छरणं किञ्चिद्धर्मराजो युधिष्ठिरः |  ४   क
चिन्तय़ामास राजेन्द्र कथमेतद्भविष्यति ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति