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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
उवाच निय़मज्ञा च कल्याणी सा प्रिय़ंवदा |  ८   क
भगवन्मुनिशार्दूल किमाज्ञापय़सि प्रभो ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति