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भीष्म पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनः पञ्चविंशत्या भीष्ममार्च्छच्छितैः शरैः |  ४७   क
भीष्मोऽपि समरे पार्थं विव्याध त्रिंशता शरैः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति