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भीष्म पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
भीष्मचापच्युतैर्वाणैर्निर्विद्धो मधुसूदनः |  ५०   क
विरराज रणे राजन्सपुष्प इव किंशुकः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति