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भीष्म पर्व
अध्याय ३३
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अर्जुन उवाच
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि; व्याप्तं त्वय़ैकेन दिशश्च सर्वाः |  २०   क
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमिदं तवोग्रं; लोकत्रय़ं प्रव्यथितं महात्मन् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति