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भीष्म पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
न तय़ोर्विवरं कश्चिद्रणे पश्यति भारत |  ६०   क
धर्मे स्थितस्य हि यथा न कश्चिद्वृजिनं क्वचित् ||  ६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति