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भीष्म पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
उभौ हि शरजालेन तावदृश्यौ वभूवतुः |  ६१   क
प्रकाशौ च पुनस्तूर्णं वभूवतुरुभौ रणे ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति