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भीष्म पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
इति स्म वाचः श्रूय़न्ते प्रोच्चरन्त्यस्ततस्ततः |  ६७   क
गाङ्गेय़ार्जुनय़ोः सङ्ख्ये स्तवय़ुक्ता विशां पते ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति