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शान्ति पर्व
अध्याय २७२
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भीष्म उवाच
ततोऽङ्गिरःसुतः श्रीमांस्ते चैव परमर्षय़ः |  २९   क
दृष्ट्वा वृत्रस्य विक्रान्तमुपगम्य महेश्वरम् |  २९   ख
ऊचुर्वृत्रविनाशार्थं लोकानां हितकाम्यया ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति