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विराट पर्व
अध्याय ६३
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विराट उवाच
वहुशः प्रतिषिद्धोऽसि न च वाचं निय़च्छसि |  ४३   क
निय़न्ता चेन्न विद्येत न कश्चिद्धर्ममाचरेत् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति