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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
उपप्लुतं यथा सोमं संशुष्कमिव सागरम् |  १७   क
पूर्णचन्द्राभवदनं काकपक्षवृताक्षकम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति