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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणकर्णमुखैः षड्भिर्धार्तराष्ट्रैर्महारथैः |  २१   क
एकोऽय़ं निहतः शेते नैष धर्मो मतो हि नः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति