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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
विचित्रैश्च परिस्तोमैः पताकाभिश्च संवृता |  २४   क
चामरैश्च कुथाभिश्च प्रविद्धैश्चाम्वरोत्तमैः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति