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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
चापैश्च विशिखैश्छिन्नैः शक्त्यृष्टिप्रासकम्पनैः |  २६   क
विविधैराय़ुधैश्चान्यैः संवृता भूरशोभत ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति