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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तद्यदि त्वं विजानासि किं तद्व्रूहि सुमध्यमे |  ७०   क
स्वप्नो मे यदि वा दृष्टो यदि वा सत्यमेव तत् ||  ७०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति