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सभा पर्व
अध्याय १९
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वैशम्पाय़न उवाच
चैत्यकं च गिरेः शृङ्गं भित्त्वा किमिव सद्म नः |  ४१   क
अद्वारेण प्रविष्टाः स्थ निर्भय़ा राजकिल्विषात् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति