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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
निरीक्षमाणास्तु वय़ं परे चाय़ोधनं शनैः |  ४०   क
अपय़ाता महाराज ग्लानिं प्राप्ता विचेतसः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति