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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
ततो निशाय़ा दिवसस्य चाशिवः; शिवारुतः सन्धिरवर्तताद्भुतः |  ४१   क
कुशेशय़ापीडनिभे दिवाकरे; विलम्वमानेऽस्तमुपेत्य पर्वतम् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति