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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
वरासिशक्त्यृष्टिवरूथचर्मणां; विभूषणानां च समाक्षिपन्प्रभाम् |  ४२   क
दिवं च भूमिं च समानय़न्निव; प्रिय़ां तनुं भानुरुपैति पावकम् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति