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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
रथाश्ववृन्दैः सहसादिभिर्हतैः; प्रविद्धभाण्डाभरणैः पृथग्विधैः |  ४५   क
निरस्तजिह्वादशनान्त्रलोचनै; र्धरा वभौ घोरविरूपदर्शना ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति