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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
त्वचो विनिर्भिद्य पिवन्वसामसृ; क्तथैव मज्जां पिशितानि चाश्नुवन् |  ४८   क
वपां विलुम्पन्ति हसन्ति गान्ति च; प्रकर्षमाणाः कुणपान्यनेकशः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति