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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
तथा तदाय़ोधनमुग्रदर्शनं; निशामुखे पितृपतिराष्ट्रसंनिभम् |  ५२   क
निरीक्षमाणाः शनकैर्जहुर्नराः; समुत्थितारुण्डकुलोपसङ्कुलम् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति